अलवर, राजस्थान —
अलवर जिला अस्पताल में 7 दिसंबर को एक बड़ा मामला सामने आया, जब मोर्चरी में रखे शवों की अदला-बदली के कारण 76 वर्षीय कैलाश के परिजनों ने गलती से 70 वर्षीय मोहम्मद साबिर का अंतिम संस्कार कर दिया। तीन दिन बाद जब परिवार अस्थियां विसर्जन करने हरिद्वार जा रहा था, तब उन्हें पता चला कि उन्होंने एक मुस्लिम व्यक्ति का अंतिम संस्कार कर दिया है।

तीन शवों के कारण हुई गड़बड़ी

यह पूरा मामला 6 दिसंबर से शुरू हुआ, जब पुलिस को अलग-अलग स्थानों से तीन लावारिस शव मिले। एमआइए थाना पुलिस को कैलाश (80), पुत्र रामप्रसाद निवासी राजगढ़ का शव सड़क किनारे मिला था। पहचान आधार कार्ड के ज़रिए हुई थी। पुलिस ने पोस्टमॉर्टम के बाद शव मोर्चरी में रखवा दिया था। इसी बीच जीआरपी पुलिस को ट्रेन में एक अन्य शव मिला, जो गुलाम साबिर का था।

मोर्चरी में जब शव रखे गए तो पहचान में लापरवाही के चलते आधार कार्ड गलत शव के साथ लगा दिया गया। इसी गलती के चलते कैलाश के परिवार ने साबिर के शव को कैलाश समझ लिया और उसका दाह संस्कार कर दिया।

परिजनों ने जताया आक्रोश

मामले के खुलासे के बाद मंगलवार को कैलाश का परिवार और मुस्लिम समाज के लोग जिला अस्पताल पहुंचे। दोनों समुदायों ने मिलकर अस्पताल प्रशासन और पुलिस पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाया।
मुस्लिम महासभा के जिलाध्यक्ष राहुल खान ने बताया कि साबिर की डायरी में मिले संपर्क नंबरों से उसकी पहचान संभव थी, लेकिन जीआरपी और अस्पताल स्टाफ ने इस पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है।

कांग्रेस प्रदेश सचिव हुसैन सुल्तानिया ने भी घटना को “घोर लापरवाही” बताते हुए अस्पताल प्रशासन और पुलिस की जवाबदेही तय करने की बात कही है।

पुलिस ने संभाला मामला

घटना का पता चलते ही पुलिस ने कैलाश का असली शव उनके परिवार को सौंप दिया। वहीं, साबिर की अस्थियों को जीआरपी पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया है ताकि मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार किया जा सके।
जीआरपी थाना प्रभारी अंजू महेन्द्रा के अनुसार, गुलाम साबिर की मौत ट्रेन में सफर के दौरान हुई थी। उनका शव अलवर जंक्शन पर उतारकर मोर्चरी में रखा गया था, जिसे गलती से कैलाश का मान लिया गया।

बड़ी प्रशासनिक चूक पर उठे सवाल

स्थानीय समाजसेवियों और नागरिकों ने सवाल उठाया है कि अगर शवों की पहचान सत्यापित करने की प्रक्रिया सही होती, तो यह शर्मनाक घटना नहीं होती। लोगों ने मांग की है कि अस्पताल प्रशासन और पुलिस की जवाबदेही तय कर ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जाए।

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